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वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय चिंताएँ (Global Environmental Concerns)

वैश्विक पर्यावरणीय चिंताएँ

परिचय: वैश्विक पर्यावरणीय चिंताएँ उन समस्याओं को संदर्भित करती हैं जो राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर पूरे ग्रह और मानवता को प्रभावित करती हैं। औद्योगीकरण, शहरीकरण और अनियंत्रित उपभोग ने इन समस्याओं को गंभीर बना दिया है, जिनमें जलवायु परिवर्तन, ओजोन परत का क्षरण, और जैव विविधता का क्षरण प्रमुख हैं। इन चुनौतियों का समाधान किसी एक देश के बस में नहीं है, इसलिए इनसे निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य है।

1. जलवायु परिवर्तन (Climate Change)

अवधारणा: पृथ्वी के औसत तापमान में दीर्घकालिक वृद्धि और मौसम के पैटर्न में बदलाव को जलवायु परिवर्तन कहा जाता है।

  • कारण: इसका मुख्य कारण मानव गतिविधियों, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) के जलने से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) जैसे कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4) का उत्सर्जन है। ये गैसें वायुमंडल में एक परत बना लेती हैं जो सूर्य की गर्मी को बाहर जाने से रोकती हैं, जिसे ‘ग्रीनहाउस प्रभाव’ कहते हैं।
  • प्रभाव: समुद्र के स्तर में वृद्धि (तटीय शहरों के डूबने का खतरा), ग्लेशियरों का पिघलना (नदियों में जल प्रवाह की अनिश्चितता), चरम मौसम की घटनाएं (बाढ़, सूखा, चक्रवात), कृषि उत्पादकता में कमी, और पारिस्थितिक तंत्र का विनाश।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रयास:
    • संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC), 1992: यह समस्या से निपटने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संधि है। इसका मुख्य सिद्धांत ‘साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियां’ (Common but Differentiated Responsibilities – CBDR) है, जिसका अर्थ है कि विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी अधिक है।
    • क्योटो प्रोटोकॉल, 1997: इसने विकसित देशों (Annex-I देशों) के लिए उत्सर्जन में कमी के बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित किए, लेकिन विकासशील देशों के लिए नहीं।
    • पेरिस समझौता, 2015: यह एक ऐतिहासिक समझौता है जिसमें लगभग सभी देशों ने भाग लिया। इसका लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2°C से काफी नीचे, अधिमानतः 1.5°C तक सीमित करना है। इसके तहत, प्रत्येक देश अपने ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (Nationally Determined Contributions – NDCs) प्रस्तुत करता है।

2. ओजोन परत का क्षरण (Ozone Layer Depletion)

अवधारणा: समताप मंडल (stratosphere) में स्थित ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV-B) किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है।

  • कारण: इसका मुख्य कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हैलोजन और अन्य मानव निर्मित रसायनों का उत्सर्जन है, जो रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर और एयरोसोल स्प्रे में उपयोग किए जाते थे।
  • प्रभाव: ओजोन क्षरण से पृथ्वी पर अधिक UV किरणें पहुंचती हैं, जिससे मनुष्यों में त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद और प्रतिरक्षा प्रणाली की समस्याएं हो सकती हैं। यह जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और फसलों को भी नुकसान पहुंचाता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रयास:
    • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, 1987: यह एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसे ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS) के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसे अब तक की सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधियों में से एक माना जाता है क्योंकि इसके परिणामस्वरूप ओजोन परत धीरे-धीरे ठीक हो रही है।

3. जैव विविधता का क्षरण (Biodiversity Loss)

अवधारणा: जैव विविधता का अर्थ है पृथ्वी पर जीवन की विविधता, जिसमें प्रजातियों, पारिस्थितिक तंत्रों और आनुवंशिक भिन्नता शामिल है।

  • कारण: वनों की कटाई, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, और आक्रामक प्रजातियों के कारण प्राकृतिक आवासों का विनाश।
  • प्रभाव: पारिस्थितिक तंत्र का असंतुलन, खाद्य श्रृंखला का टूटना, और मनुष्यों के लिए आवश्यक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं (जैसे परागण, स्वच्छ पानी, औषधीय पौधे) का नुकसान।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रयास:
    • जैव विविधता पर कन्वेंशन (Convention on Biological Diversity – CBD), 1992: इसका उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण, इसके घटकों का सतत उपयोग, और आनुवंशिक संसाधनों से होने वाले लाभों का उचित और न्यायसंगत बंटवारा है।
    • नागोया प्रोटोकॉल: यह CBD के तहत एक पूरक समझौता है जो आनुवंशिक संसाधनों तक पहुंच और लाभ-साझाकरण से संबंधित है।

4. मरुस्थलीकरण (Desertification)

अवधारणा: यह शुष्क, अर्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में भूमि के क्षरण की प्रक्रिया है, जिसके परिणामस्वरूप उपजाऊ भूमि रेगिस्तान में बदल जाती है।

  • कारण: वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, अस्थिर कृषि पद्धतियां, और जलवायु परिवर्तन।
  • प्रभाव: खाद्य सुरक्षा को खतरा, गरीबी में वृद्धि, और जैव विविधता का नुकसान।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रयास:
    • संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम कन्वेंशन (UNCCD), 1994: यह मरुस्थलीकरण से निपटने और सूखे के प्रभावों को कम करने के लिए एकमात्र कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1: जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं में ‘साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियां’ (Common but Differentiated Responsibilities) के सिद्धांत का आलोचनात्मक विश्लेषण करें। इस सिद्धांत पर भारत का क्या रुख रहा है? (250 शब्द)
प्रश्न 2: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को अक्सर सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि क्यों माना जाता है? इसकी सफलता के पीछे के प्रमुख कारकों पर चर्चा करें। (250 शब्द)
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Comments 2

  1. EdwardPeeby says:
    4 months ago

    Many thanks to you for support. I should.

    Reply
  2. Robertbeala says:
    4 months ago

    Excellent platform for UPSC and State PSC preparation! The handwritten-style notes make concepts super easy to understand. The topic-wise quizzes are a great add-on for revision.

    Reply

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