1. परिचय: प्रायद्वीपीय भारत का हृदय
दक्कन का पठार भारत का सबसे बड़ा पठार है, जो देश के दक्षिणी भाग के अधिकांश हिस्से को कवर करता है। यह एक त्रिकोणीय भूभाग है जो उत्तर में सतपुड़ा श्रृंखला, पश्चिम में पश्चिमी घाट और पूर्व में पूर्वी घाट से घिरा है। यह प्राचीन गोंडवानालैंड का हिस्सा है और अपनी अनूठी भूवैज्ञानिक संरचना, उपजाऊ काली मिट्टी और समृद्ध खनिज संसाधनों के लिए जाना जाता है।
2. निर्माण और भूविज्ञान: दक्कन ट्रैप
दक्कन के पठार का निर्माण मेसोज़ोइक युग के अंत में (लगभग 66 मिलियन वर्ष पूर्व) हुआ था। इसका निर्माण एक शांत दरारी उद्भेदन (Fissure Eruption) से निकले बेसाल्टिक लावा के व्यापक प्रवाह के कारण हुआ। लावा की परतें एक के ऊपर एक सीढ़ी-नुमा संरचना में जम गईं, जिसे ‘दक्कन ट्रैप’ (Deccan Traps) कहा जाता है (‘ट्रैप’ स्वीडिश शब्द ‘ट्रैपा’ से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘सीढ़ी’)। इन बेसाल्टिक चट्टानों के अपक्षय से काली मिट्टी या रेगुर मिट्टी का निर्माण हुआ, जो कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है।
3. भौगोलिक विभाजन (Geographical Divisions)
दक्कन के पठार को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:
A. महाराष्ट्र का पठार
- यह दक्कन ट्रैप का एक बड़ा हिस्सा कवर करता है और मुख्य रूप से बेसाल्टिक चट्टानों से बना है।
- इसकी सतह काली मिट्टी से ढकी हुई है और यह क्षेत्र कपास और गन्ने के उत्पादन के लिए जाना जाता है।
- गोदावरी, भीमा और कृष्णा जैसी नदियाँ इस क्षेत्र से होकर बहती हैं।
B. कर्नाटक का पठार (मैसूर का पठार)
- यह पठार महाराष्ट्र पठार के दक्षिण में स्थित है और मुख्य रूप से आर्कियन युग की चट्टानों से बना है।
- इसे दो भागों में बांटा गया है: पश्चिम में मलनाड (Malnad), जो एक पहाड़ी और वनाच्छादित क्षेत्र है, और पूर्व में मैदान (Maidan), जो एक समतल मैदानी क्षेत्र है।
- यह लौह अयस्क और कॉफी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। बाबा बुदन की पहाड़ियाँ यहीं स्थित हैं।
C. तेलंगाना का पठार (आंध्र का पठार)
- यह पठार के पूर्वी भाग में स्थित है।
- इसे भी दो भागों में विभाजित किया गया है: उत्तरी भाग को तेलंगाना पठार और दक्षिणी भाग को रायलसीमा पठार कहा जाता है।
- गोदावरी और कृष्णा नदियाँ इस क्षेत्र की सिंचाई और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
4. नदी प्रणाली और अपवाह तंत्र (River System and Drainage)
पठार का सामान्य ढलान पश्चिम से पूर्व की ओर है, जिसके कारण अधिकांश प्रायद्वीपीय नदियाँ जैसे महानदी, गोदावरी, कृष्णा, और कावेरी बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं और अपने मुहाने पर उपजाऊ डेल्टा बनाती हैं। नर्मदा और तापी एकमात्र प्रमुख नदियाँ हैं जो पश्चिम की ओर बहती हैं और भ्रंश घाटियों से होकर अरब सागर में गिरती हैं।
5. आर्थिक महत्व (Economic Significance)
- कृषि: काली मिट्टी कपास, गन्ना, ज्वार, बाजरा और तिलहन जैसी फसलों के लिए अत्यधिक उपजाऊ है।
- खनिज संसाधन: पठार के विभिन्न हिस्सों में कोयला, लौह अयस्क, मैंगनीज, अभ्रक और बॉक्साइट के विशाल भंडार हैं। छोटा नागपुर पठार, जो प्रायद्वीपीय ब्लॉक का विस्तार है, ‘भारत का रूर’ कहलाता है।
- जलविद्युत: पठारी नदियों पर कई बहुउद्देशीय परियोजनाएँ स्थापित की गई हैं जो सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन में मदद करती हैं।
- वन संपदा: पश्चिमी और पूर्वी घाट के जंगल सागौन, चंदन और अन्य मूल्यवान लकड़ी प्रदान करते हैं।
6. सारांश: दक्कन के पठार के मुख्य तथ्य
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| स्थान | प्रायद्वीपीय भारत, पश्चिमी और पूर्वी घाट के बीच |
| निर्माण | क्रेटेशियस काल में दरारी ज्वालामुखी उद्भेदन |
| प्रमुख भूवैज्ञानिक संरचना | दक्कन ट्रैप (बेसाल्टिक लावा प्रवाह) |
| प्रमुख मिट्टी | काली मिट्टी (रेगुर) |
| प्रमुख फसल | कपास, गन्ना, ज्वार-बाजरा |
| प्रमुख नदियाँ | गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी (पूर्व की ओर बहने वाली) |
| प्रमुख खनिज | कोयला, लौह अयस्क, मैंगनीज, बॉक्साइट |