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तिब्बती पठार (Tibetan Plateau)

1. परिचय: ‘दुनिया की छत’ (Introduction: The Roof of the World)

तिब्बती पठार मध्य एशिया में स्थित एक विशाल और ऊँचा अंतरापर्वतीय पठार है। अपनी औसत ऊँचाई (4,500 मीटर से अधिक) के कारण इसे ‘दुनिया की छत’ (The Roof of the World) कहा जाता है। यह न केवल एक प्रमुख भू-आकृतिक विशेषता है, बल्कि यह एशिया की जलवायु, विशेष रूप से भारतीय मानसून को नियंत्रित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर बर्फ के सबसे बड़े भंडार के कारण इसे ‘तीसरा ध्रुव’ (The Third Pole) भी कहा जाता है।

2. निर्माण और भूविज्ञान (Formation and Geology)

तिब्बती पठार का निर्माण प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका निर्माण लगभग 50-55 मिलियन वर्ष पूर्व सेनोज़ोइक युग (Cenozoic Era) में शुरू हुआ, जब भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियन प्लेट से टकराई। इस अभिसरण के परिणामस्वरूप, टेथिस सागर के अवसाद मुड़कर हिमालय पर्वत श्रृंखला के रूप में ऊपर उठे, और भारतीय प्लेट के दबाव ने यूरेशियन प्लेट के भूभाग को ऊपर उठाकर इस विशाल पठार का निर्माण किया। यह प्रक्रिया आज भी जारी है, जिससे यह क्षेत्र भूवैज्ञानिक रूप से सक्रिय है।

3. भौगोलिक विशेषताएँ (Geographical Features)

  • विस्तार: यह पठार दक्षिण में हिमालय, उत्तर में कुनलुन शान और पूर्व में किलियन पर्वत से घिरा है।
  • ट्रांस-हिमालयी श्रेणियाँ: कई महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखलाएँ, जिन्हें सामूहिक रूप से ट्रांस-हिमालय कहा जाता है, इस पठार पर स्थित हैं, जिनमें काराकोरम, लद्दाख, और कैलाश श्रेणियाँ शामिल हैं।
  • नदियों का उद्गम स्थल: यह ‘एशिया का वाटर टावर’ है, जहाँ से महाद्वीप की कई प्रमुख नदियाँ निकलती हैं, जैसे सिंधु, ब्रह्मपुत्र, मेकांग, यांग्त्ज़ी, और ह्वांग हो।
  • झीलें: पठार पर हजारों झीलें हैं, जिनमें से अधिकांश खारे पानी की हैं और एक अंतःप्रवाही जल निकासी प्रणाली (endorheic drainage system) का हिस्सा हैं। मानसरोवर और राकसताल प्रमुख झीलें हैं।

4. भारतीय मानसून पर प्रभाव (Influence on Indian Monsoon)

तिब्बती पठार भारतीय मानसून को संचालित करने वाले एक हीट इंजन के रूप में कार्य करता है। (यह मेन्स परीक्षा के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है)।

  • ग्रीष्मकालीन तापन (Summer Heating): गर्मियों में, पठार की ऊँचाई और विशालता के कारण यह सूर्य की किरणों से अत्यधिक गर्म हो जाता है। यह गर्म हवा ऊपर उठती है, जिससे क्षोभमंडल के ऊपरी स्तरों (6-8 किमी) पर एक गहन निम्न दाब क्षेत्र (Intense Low-Pressure Area) बन जाता है।
  • उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (TEJ) का निर्माण: पठार के ऊपर बने इस निम्न दाब को भरने के लिए हिंद महासागर से हवाएँ आती हैं, और ऊपरी वायुमंडल में एक चक्रीय परिसंचरण स्थापित होता है। इससे उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (Tropical Easterly Jetstream – TEJ) मजबूत होती है, जो मानसून को भारत की ओर धकेलने में मदद करती है।
  • भौतिक अवरोध: यह जेट स्ट्रीम को विभाजित करने और एक बाधा के रूप में भी कार्य करता है जो मानसून की हवाओं को उत्तर की ओर जाने से रोकता है और उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप पर केंद्रित करता है।

5. पर्यावरणीय और रणनीतिक महत्व (Environmental and Strategic Importance)

  • ‘तीसरा ध्रुव’: यह ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद ग्लेशियरों और मीठे पानी का सबसे बड़ा स्रोत है, जो अरबों लोगों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करता है। जलवायु परिवर्तन के कारण यहाँ के ग्लेशियरों का पिघलना एक गंभीर चिंता का विषय है।
  • जैव विविधता: पठार की कठोर जलवायु के बावजूद, यहाँ अद्वितीय जीव-जंतु पाए जाते हैं, जैसे याक, तिब्बती मृग (चिरू), और हिम तेंदुआ।
  • रणनीतिक और जल-राजनीति (Hydro-politics): चीन के नियंत्रण में होने के कारण, यह पठार भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक चिंता का विषय है। ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों पर चीन द्वारा बनाए जा रहे बांध भारत और बांग्लादेश के लिए जल सुरक्षा के मुद्दे खड़े करते हैं।

6. सारांश: तिब्बती पठार के मुख्य तथ्य

पहलू विवरण
उपनाम दुनिया की छत, तीसरा ध्रुव, एशिया का वाटर टावर
निर्माण भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के अभिसरण से (सेनोज़ोइक युग)
प्रकार अंतरापर्वतीय पठार (Intermontane Plateau)
प्रमुख नदियाँ सिंधु, ब्रह्मपुत्र, मेकांग, यांग्त्ज़ी
मानसून पर भूमिका ग्रीष्मकालीन ‘हीट इंजन’, निम्न दाब क्षेत्र का निर्माण, TEJ को मजबूत करना
रणनीतिक महत्व प्रमुख नदियों का स्रोत (जल-राजनीति), चीन के नियंत्रण में
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