परिचय: हरित क्रांति की पृष्ठभूमि
1960 के दशक की शुरुआत में, भारत गंभीर खाद्य संकट का सामना कर रहा था। जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी, लेकिन कृषि उत्पादन स्थिर था, जिससे देश को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए खाद्यान्न, विशेष रूप से गेहूं, आयात करना पड़ता था। इस खाद्य असुरक्षा की स्थिति से निपटने के लिए, 1966-67 में भारत में हरित क्रांति (Green Revolution) की शुरुआत की गई। यह एक ऐसी अवधि थी जब आधुनिक कृषि तकनीकों और प्रौद्योगिकियों को अपनाकर कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
विश्व स्तर पर, नॉर्मन बोरलॉग (Norman Borlaug) को ‘हरित क्रांति का जनक’ माना जाता है, जबकि भारत में, डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन (Dr. M.S. Swaminathan) को ‘भारत में हरित क्रांति का जनक’ कहा जाता है।
1. हरित क्रांति के प्रमुख घटक
हरित क्रांति की सफलता एक पैकेज कार्यक्रम पर आधारित थी, जिसमें कई घटक एक साथ काम करते थे:
- अधिक उपज देने वाले बीज (High-Yielding Variety – HYV Seeds): यह हरित क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण घटक था। गेहूं (मेक्सिको से) और चावल (फिलीपींस से) की बौनी, अधिक उपज देने वाली और जल्दी पकने वाली किस्मों का उपयोग किया गया।
- रासायनिक उर्वरक (Chemical Fertilizers): HYV बीजों को अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने के लिए बड़ी मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती थी, जिसे रासायनिक उर्वरकों (नाइट्रोजन, फॉस्फेट, पोटाश) के उपयोग से पूरा किया गया।
- निश्चित सिंचाई (Assured Irrigation): HYV बीजों को नियमित और नियंत्रित जल आपूर्ति की आवश्यकता होती है, इसलिए सिंचाई सुविधाओं, विशेष रूप से नलकूपों और नहरों का विस्तार किया गया।
- कीटनाशक और खरपतवारनाशक (Pesticides and Herbicides): नई किस्मों को बीमारियों और कीटों से बचाने के लिए इन रसायनों का उपयोग आवश्यक था।
- कृषि मशीनीकरण (Farm Mechanization): ट्रैक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर और पंप सेट जैसी मशीनों के उपयोग को बढ़ावा दिया गया ताकि खेती को और अधिक कुशल बनाया जा सके।
2. हरित क्रांति के सकारात्मक प्रभाव
- खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि: हरित क्रांति का सबसे बड़ा प्रभाव खाद्यान्न, विशेष रूप से गेहूं और चावल, के उत्पादन में भारी वृद्धि थी।
- खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता: भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गया और आयातक देश से निर्यातक देश बनने की दिशा में अग्रसर हुआ।
- किसानों की आय में वृद्धि: अधिक उत्पादन के कारण, विशेष रूप से बड़े किसानों की आय में वृद्धि हुई, जिससे ग्रामीण समृद्धि बढ़ी।
- औद्योगिक विकास: उर्वरक, कीटनाशक और कृषि मशीनरी बनाने वाले उद्योगों को बढ़ावा मिला।
- बफर स्टॉक का निर्माण: सरकार भारतीय खाद्य निगम (FCI) के माध्यम से गेहूं और चावल का बफर स्टॉक बनाने में सक्षम हुई, जिसका उपयोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के लिए और अकाल के समय किया जा सकता है।
3. हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभाव
- क्षेत्रीय असमानताएँ: हरित क्रांति का लाभ मुख्य रूप से सिंचाई की अच्छी सुविधा वाले राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रहा। पूर्वी और दक्षिणी भारत के वर्षा-आधारित क्षेत्र काफी हद तक इससे अछूते रहे।
- किसानों के बीच असमानता: चूँकि नई तकनीक महंगी थी, इसका लाभ केवल बड़े और धनी किसान ही उठा सके। छोटे और सीमांत किसान पीछे रह गए, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में आय की असमानता बढ़ी।
- पर्यावरणीय गिरावट:
- भूजल का अत्यधिक दोहन: नलकूपों के माध्यम से अत्यधिक सिंचाई के कारण भूजल स्तर में भारी गिरावट आई।
- मिट्टी का क्षरण: रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता और सूक्ष्मजीव नष्ट हो गए।
- जल प्रदूषण: उर्वरकों और कीटनाशकों के अवशेष जल स्रोतों में मिलकर उन्हें प्रदूषित करने लगे।
- फसल विविधता में कमी: गेहूं और चावल पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करने के कारण, दालों, तिलहन और मोटे अनाजों जैसी पारंपरिक और पौष्टिक फसलों की खेती का क्षेत्र कम हो गया।