1. परिचय: समुद्री सीमा विवाद क्या हैं?
समुद्री सीमा विवाद (Maritime Boundary Disputes) दो या दो से अधिक देशों के बीच समुद्री क्षेत्रों पर अतिव्यापी दावों (overlapping claims) से उत्पन्न होते हैं। ये विवाद अक्सर प्रादेशिक सागर (Territorial Sea), अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ), और महाद्वीपीय शेल्फ (Continental Shelf) के सीमांकन से संबंधित होते हैं। 21वीं सदी में, समुद्री संसाधनों (जैसे तेल, गैस, मत्स्य) और रणनीतिक समुद्री मार्गों पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण इन विवादों का महत्व बढ़ गया है।
2. समुद्री विवादों के प्रमुख कारण
- आर्थिक संसाधन: समुद्र तल के नीचे स्थित हाइड्रोकार्बन (तेल और गैस) और मत्स्य संसाधनों पर नियंत्रण के लिए प्रतिस्पर्धा विवादों का एक प्रमुख कारण है।
- ऐतिहासिक दावे: देश अक्सर द्वीपों और समुद्री क्षेत्रों पर अपनी संप्रभुता के लिए ऐतिहासिक अधिकारों और नक्शों का हवाला देते हैं, जो एक-दूसरे के दावों से टकराते हैं।
- रणनीतिक महत्व: महत्वपूर्ण समुद्री संचार लाइनों (SLOCs) पर नियंत्रण और नौसैनिक प्रभुत्व स्थापित करने की इच्छा भी विवादों को बढ़ावा देती है।
- अंतर्राष्ट्रीय कानून की अस्पष्टता: यद्यपि UNCLOS एक कानूनी ढांचा प्रदान करता है, लेकिन आधार रेखा खींचने और भौगोलिक विशेषताओं की व्याख्या जैसे मुद्दों पर अस्पष्टताएँ विवादों को जन्म दे सकती हैं।
3. विश्व के प्रमुख समुद्री विवाद
A. दक्षिण चीन सागर विवाद
यह दुनिया का सबसे जटिल और विवादास्पद समुद्री विवाद है। चीन अपनी “नाइन-डैश लाइन” के आधार पर लगभग पूरे समुद्र पर दावा करता है, जो वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, और ब्रुनेई जैसे आसियान देशों के EEZ दावों का अतिक्रमण करता है। 2016 में, एक अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने चीन के दावे को खारिज कर दिया, लेकिन चीन ने इसे मानने से इनकार कर दिया।
B. पूर्वी चीन सागर विवाद
यह विवाद मुख्य रूप से चीन और जापान के बीच सेनकाकू/दियाओयू द्वीपों को लेकर है। इन द्वीपों के आसपास के क्षेत्र में तेल और गैस के महत्वपूर्ण भंडार होने का अनुमान है, जिससे यह विवाद और भी तीव्र हो गया है।
C. एजियन सागर विवाद
यह ग्रीस और तुर्की के बीच एक लंबा और जटिल विवाद है, जो प्रादेशिक जल, महाद्वीपीय शेल्फ और हवाई क्षेत्र की सीमाओं के सीमांकन से संबंधित है।
4. भारत के समुद्री सीमा विवाद और समाधान
A. भारत-बांग्लादेश समुद्री सीमा समाधान
यह विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। दोनों देशों के बीच बंगाल की खाड़ी में समुद्री सीमा को लेकर लंबे समय से विवाद था। 2014 में, हेग में स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) ने दोनों पक्षों के दावों को ध्यान में रखते हुए एक फैसला सुनाया, जिसे दोनों देशों ने स्वीकार कर लिया। इस फैसले ने भारत और बांग्लादेश के बीच संबंधों को मजबूत किया और अपतटीय अन्वेषण का मार्ग प्रशस्त किया।
B. सर क्रीक विवाद (भारत-पाकिस्तान)
यह गुजरात (भारत) और सिंध (पाकिस्तान) के बीच 96 किलोमीटर लंबी ज्वारीय मुहाना (tidal estuary) सर क्रीक के सीमांकन को लेकर है। पाकिस्तान का दावा है कि सीमा क्रीक के पूर्वी किनारे पर होनी चाहिए, जबकि भारत का तर्क है कि यह “थालवेग सिद्धांत” (Thalweg principle) के अनुसार, नौगम्य चैनल के मध्य में होनी चाहिए। यह विवाद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के सीमांकन को भी प्रभावित करता है, जो मछली पकड़ने और संभावित हाइड्रोकार्बन संसाधनों के लिए महत्वपूर्ण है।
5. विवाद समाधान में UNCLOS की भूमिका
समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCLOS) को “महासागरों का संविधान” कहा जाता है। यह समुद्री क्षेत्रों को परिभाषित करने और देशों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को निर्धारित करने के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा प्रदान करता है। यह विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए तंत्र भी स्थापित करता है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) और समुद्र के कानून के लिए अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण (ITLOS) के माध्यम से अनिवार्य मध्यस्थता या अधिनिर्णय शामिल है।