परिचय: स्थानांतरण कृषि क्या है?
स्थानांतरण कृषि (Shifting Cultivation) एक पारंपरिक कृषि पद्धति है जो मुख्य रूप से दुनिया के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों द्वारा अपनाई जाती है। इसे ‘कर्तन-दहन कृषि’ (Slash-and-Burn Agriculture) के रूप में भी जाना जाता है। भारत में, यह प्रथा विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी पहाड़ी राज्यों, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में प्रचलित है। इसका सबसे आम नाम ‘झूम खेती’ (Jhum Cultivation) है।
1. स्थानांतरण कृषि की प्रक्रिया
इस कृषि पद्धति में एक चक्रीय प्रक्रिया शामिल होती है:
- स्थल का चयन और सफाई: किसान जंगल के एक हिस्से का चयन करते हैं और वहाँ की वनस्पतियों (पेड़ों, झाड़ियों) को काट देते हैं।
- जलाना: कटी हुई वनस्पति को सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है और फिर उसे जला दिया जाता है। इससे भूमि साफ हो जाती है और राख मिट्टी के लिए पोटाश युक्त उर्वरक का काम करती है।
- बुवाई और खेती: मानसून की पहली बारिश के बाद, किसान इस साफ की गई भूमि पर आदिम औजारों से बीज बोते हैं। वे मुख्य रूप से अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए अनाज और सब्जियाँ उगाते हैं।
- परती छोड़ना (Fallow Period): 2-3 वर्षों तक खेती करने के बाद, जब मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है और खरपतवार बढ़ जाते हैं, तो किसान उस भूमि को छोड़ देते हैं और खेती के लिए जंगल के एक नए टुकड़े पर चले जाते हैं। छोड़ी गई भूमि को 10 से 20 वर्षों के लिए परती छोड़ दिया जाता है ताकि जंगल प्राकृतिक रूप से फिर से उग सके और मिट्टी अपनी उर्वरता पुनः प्राप्त कर सके।
2. भारत के विभिन्न राज्यों में स्थानांतरण कृषि के नाम
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इस कृषि पद्धति को अलग-अलग स्थानीय नामों से जाना जाता है:
| राज्य / क्षेत्र | स्थानीय नाम |
|---|---|
| उत्तर-पूर्वी राज्य (असम, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड) | झूम (Jhum) |
| मध्य प्रदेश | बेवर (Bewar) या दहिया (Dahiya) |
| आंध्र प्रदेश | पोडु (Podu) या पेंडा (Penda) |
| ओडिशा | पामा डाबी (Pama Dabi), कोमान (Koman) या ब्रिंगा (Bringa) |
| पश्चिमी घाट | कुमारी (Kumari) |
| राजस्थान (दक्षिण-पूर्वी) | वालरे (Valre) या वाल्ट्रे (Waltre) |
| हिमालयी क्षेत्र | खिल (Khil) |
| झारखंड | कुरुवा (Kuruwa) |
| मणिपुर | पामलू (Pamlou) |
| छत्तीसगढ़ (बस्तर जिला) | दीपा (Dipa) |
3. स्थानांतरण कृषि के प्रभाव और चुनौतियाँ
हालांकि यह एक पारंपरिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण प्रथा है, लेकिन इसके कई नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभाव हैं, खासकर जब जनसंख्या का दबाव बढ़ता है:
- वनों की कटाई (Deforestation): यह वनों के विनाश का एक प्रमुख कारण है।
- मृदा अपरदन (Soil Erosion): वनस्पति के हटने से भूमि बारिश और हवा के प्रति संवेदनशील हो जाती है, जिससे मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत बह जाती है।
- जैव विविधता का क्षरण (Loss of Biodiversity): जंगलों के जलने से वनस्पतियों और जीवों के आवास नष्ट हो जाते हैं।
- परती चक्र का छोटा होना: जनसंख्या बढ़ने के कारण, अब किसानों को बहुत जल्दी उसी भूमि पर वापस लौटना पड़ता है। इससे परती अवधि (fallow period) कम हो गई है, जिससे मिट्टी को अपनी उर्वरता पुनः प्राप्त करने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है।
इन नकारात्मक प्रभावों के कारण, सरकारें आदिवासी समुदायों को स्थायी और बसे हुए कृषि के तरीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं।