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हिंदी साहित्य के प्रमुख आंदोलन: भक्तिकालीन आंदोलन

हिंदी साहित्य का इतिहास विभिन्न कालों और आंदोलनों से भरा पड़ा है, जिन्होंने साहित्य की दिशा और स्वरूप को समय-समय पर प्रभावित किया है। ये आंदोलन समाज, संस्कृति और विचारों में आए परिवर्तनों के प्रतिबिंब हैं।

1. भक्तिकालीन आंदोलन (14वीं से 17वीं शताब्दी)

भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग माना जाता है। यह एक ऐसा समय था जब धर्म, समाज और साहित्य में एक गहरा बदलाव आया। इस आंदोलन का मूल आधार ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत प्रेम और समर्पण था, जो जाति, धर्म और लिंग के बंधनों से परे था।

भक्तिकाल की सामान्य विशेषताएँ

भले ही भक्तिकाल में अलग-अलग विचारधाराएँ प्रचलित थीं, परंतु उनमें कुछ ऐसी मौलिक समानताएँ थीं जो पूरे कालखंड को एक सूत्र में पिरोती हैं।

1. भक्ति की प्रधानता और निस्वार्थ प्रेम

इस काल के सभी कवियों ने ज्ञान और कर्म के स्थान पर भक्ति को मोक्ष का सर्वश्रेष्ठ मार्ग माना है। साध्य केवल ईश्वर है और साधन भक्ति। यह भक्ति किसी लौकिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि आत्मिक सुख और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण के लिए थी। कवियों ने ‘दास्य’, ‘सख्य’, ‘वात्सल्य’ और ‘कांता’ भाव से अपने आराध्य की उपासना की है।

2. गुरु की महिमा का गुणगान

भक्तिकाल की सबसे अनिवार्य विशेषता गुरु का महत्व है। निर्गुण और सगुण दोनों ही संप्रदायों ने माना है कि गुरु के बिना ज्ञान या ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है। कबीर ने तो गुरु को गोविंद से भी ऊँचा स्थान देते हुए कहा है— “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूँ पाय”। सूफी कवियों ने गुरु को ‘पीर’ के रूप में स्वीकार किया है जो साधक को ‘हकीकत’ तक पहुँचाता है।

3. अहंकार का त्याग और विनम्रता

भक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा ‘अहं’ (अहंकार) को माना गया है। जब तक साधक के भीतर ‘मैं’ का भाव रहता है, तब तक वह ‘हरि’ को प्राप्त नहीं कर सकता। तुलसीदास की ‘विनय पत्रिका’ और कबीर की साखियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि ईश्वर की कृपा पाने के लिए स्वयं को शून्य करना आवश्यक है। “जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं”—यह पंक्ति इस दर्शन को पूर्णतः स्पष्ट करती है।

4. नाम-स्मरण की महत्ता

ईश्वर के नाम का जप करना इस काल की एक अन्य प्रमुख विशेषता है। तुलसी ने “राम नाम” को कलयुग का एकमात्र सहारा बताया है, तो सूरदास ने कृष्ण के नाम का संकीर्तन किया। निर्गुण पंथियों ने भी ‘अजपा जाप’ और नाम-सुमिरन को साधना का मुख्य अंग माना है।

5. बाह्याडंबरों और रूढ़ियों का विरोध

भक्तिकाल के कवियों, विशेषकर निर्गुण संतों ने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, पाखंड, मूर्तिपूजा, तीर्थाटन और ऊँच-नीच के भेदभाव का कड़ा विरोध किया। कबीरदास ने हिंदू और मुसलमान दोनों को उनके कट्टरपन के लिए फटकारा। उन्होंने धर्म के मानवीय स्वरूप पर बल दिया और बाहरी दिखावे के बजाय अंतर्मन की शुद्धि को श्रेष्ठ बताया।

6. लोक-मंगल और समन्वय की भावना

गोस्वामी तुलसीदास को समन्वय का कवि कहा जाता है। उन्होंने सगुण-निर्गुण, ज्ञान-भक्ति, शैव-वैष्णव और राजा-प्रजा के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। भक्तिकालीन साहित्य केवल व्यक्तिगत साधना का विषय नहीं था, बल्कि उसमें समाज का हित (लोक-मंगल) सर्वोपरि था। रामचरितमानस इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ आदर्श समाज (रामराज्य) की परिकल्पना की गई है।

7. जाति-पाँति का विरोध और समानता

इस काल में जाति-प्रथा की जड़ों पर प्रहार किया गया। संतों ने घोषणा की कि “जाति-पाँति पूछे नहीं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई”। रैदास (रविदास), कबीर और नामदेव जैसे कवि समाज के वंचित वर्गों से आए थे और उन्होंने अपनी भक्ति के बल पर यह सिद्ध किया कि ईश्वर की भक्ति पर किसी विशेष जाति का एकाधिकार नहीं है।

साहित्यिक एवं शिल्पगत विशेषताएँ

लोकभाषा का प्रयोग

भक्त कवियों ने संस्कृत जैसे कठिन और पंडितों की भाषा का त्याग कर जनसामान्य की भाषा को अपनाया। इसमें अवधी (जायसी, तुलसी) और ब्रजभाषा (सूरदास, नंददास, मीरा) प्रमुख थीं। कबीर ने सधुक्कड़ी (खिचड़ी) भाषा का प्रयोग किया। लोकभाषा के प्रयोग के कारण ही यह साहित्य जन-जन तक पहुँच सका।

प्रबंध और मुक्तक काव्य

शिल्प की दृष्टि से इस काल में महाकाव्य (प्रबंध) और मुक्तक दोनों ही शैलियों का सफल प्रयोग हुआ। जायसी का ‘पद्मावत’ और तुलसी का ‘रामचरितमानस’ श्रेष्ठ प्रबंध काव्य हैं, जबकि सूरदास के पद और कबीर की साखियाँ मुक्तक काव्य के सुंदर उदाहरण हैं।

रस योजना

भक्तिकाल में शांत रस मुख्य रस के रूप में उभरकर आया। इसके अतिरिक्त ‘भक्ति रस’ को एक स्वतंत्र रस की मान्यता मिली। वात्सल्य और शृंगार रस (विप्रलंभ और संयोग) का जैसा चित्रण सूरदास ने किया है, वैसा विश्व साहित्य में दुर्लभ है।

प्रतीक और अलंकारों का प्रयोग

सूफी कवियों ने ‘मसनवी शैली’ का प्रयोग किया और प्रतीकों के माध्यम से आध्यात्मिक रहस्यों को समझाया। निर्गुण कवियों ने ‘उलटबाँसियों’ का प्रयोग कर जिज्ञासा और रहस्यवाद उत्पन्न किया। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और अनुप्रास जैसे अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप से हुआ है, यहाँ अलंकरण का कोई बोझिल प्रयास नहीं दिखता।

भक्तिकाल का दार्शनिक आधार

प्रमुख दर्शन और सिद्धांत
  • अद्वैतवाद: शंकराचार्य का दर्शन जिसने कबीर को प्रभावित किया।
  • विशिष्टाद्वैतवाद: रामानुजाचार्य का मत जिससे रामभक्ति धारा प्रेरित हुई।
  • शुद्धाद्वैतवाद: वल्लभाचार्य का दर्शन जिसने पुष्टिमार्ग के माध्यम से कृष्णभक्ति को आधार दिया।
  • द्वैतवाद: मध्वाचार्य का दर्शन।

इन दार्शनिक मतों ने कवियों को ब्रह्म, जीव, माया और मोक्ष की व्याख्या करने के लिए एक वैचारिक धरातल प्रदान किया, जिससे साहित्य में गहराई और तार्किकता आई।

नारी के प्रति दृष्टिकोण

भक्तिकालीन साहित्य में नारी के प्रति दो प्रकार के दृष्टिकोण मिलते हैं। निर्गुण संतों ने नारी को ‘माया’ का प्रतीक मानकर साधक के मार्ग की बाधा बताया (विशेषकर कबीर ने), वहीं सगुण भक्तों ने नारी को ‘शक्ति’ (सीता) और ‘भक्ति’ (मीरा, राधा) के रूप में प्रतिष्ठित किया। सूफी कवियों ने तो स्त्री को साक्षात् परमात्मा (परम सत्ता) का रूप माना और पुरुष को साधक के रूप में चित्रित किया।

प्रकृति चित्रण

भक्त कवियों ने प्रकृति का उपयोग आलंबन और उद्दीपन दोनों रूपों में किया है। जायसी के ‘बारहमासा’ में वियोग शृंगार के अंतर्गत प्रकृति का अत्यंत मार्मिक वर्णन है। सूरदास के काव्य में कृष्ण की लीलाओं के साथ वृंदावन की यमुना, कदम्ब के वृक्ष और कुंजों का सजीव वर्णन मिलता है, जो भक्त के हृदय में अनुराग उत्पन्न करता है।

भक्ति आंदोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आंदोलन मुख्य रूप से दो वैचारिक धाराओं में विभाजित था, जो ईश्वर के स्वरूप की अवधारणा पर आधारित थीं:

1. निर्गुण भक्ति धारा (Nirguna School)

इस धारा के संत ईश्वर को निराकार, अजन्मा और सर्वव्यापी मानते थे। उन्होंने मूर्तिपूजा और बाह्य आडंबरों का कड़ा विरोध किया। इसे पुनः दो उप-शाखाओं में विभाजित किया जा सकता है:

क. ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्य धारा)

इस शाखा के संतों ने ज्ञान और विवेक के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति पर बल दिया।

  • कबीरदास: इस शाखा के सबसे प्रखर संत। उन्होंने ‘बीजक’ के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया।
  • गुरु नानक देव: सिख धर्म के संस्थापक, जिन्होंने ‘एक ओंकार’ का संदेश दिया और लंगर जैसी सामूहिक प्रथाओं की शुरुआत की।
  • रैदास (रविदास): जाति प्रथा के विरुद्ध और मन की शुद्धि पर बल देने वाले महान संत।
  • दादू दयाल: राजस्थान के प्रमुख संत जिन्होंने ‘ब्रह्म संप्रदाय’ की स्थापना की।
ख. प्रेमाश्रयी शाखा (सूफी काव्य धारा)

इस शाखा के कवियों ने प्रेम को ईश्वर प्राप्ति का सर्वोच्च साधन माना और लोक-कथाओं के माध्यम से आध्यात्मिक रहस्यों को समझाया।

  • मलिक मोहम्मद जायसी: इनकी कृति ‘पद्मावत’ प्रेम के माध्यम से परमात्मा के मिलन का अनुपम उदाहरण है।
  • कुतुबन: ‘मृगावती’ के रचयिता।
  • मंझन: ‘मधुमालती’ के माध्यम से प्रेम मार्ग की व्याख्या।

2. सगुण भक्ति धारा (Saguna School)

सगुण संतों का मानना था कि ईश्वर अवतार लेता है और उसके मानवीय गुण व रूप होते हैं। उन्होंने मूर्तिपूजा, कीर्तन और मंदिर उपासना को महत्व दिया।

क. रामाश्रयी शाखा (रामभक्ति धारा)

भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम मानकर उनकी उपासना करने वाले संत इस श्रेणी में आते हैं।

  • गोस्वामी तुलसीदास: ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से राम के लोक-रक्षक रूप को घर-घर पहुँचाया। उन्होंने समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाया।
  • स्वामी रामानंद: इन्हें उत्तर भारत में भक्ति लाने का श्रेय दिया जाता है। इन्होंने ‘रामावत संप्रदाय’ की नींव रखी और जाति बंधन तोड़े।
  • नाभादास: ‘भक्तमाल’ के रचयिता जिन्होंने रामभक्तों का परिचय दिया।
ख. कृष्णाश्रयी शाखा (कृष्णभक्ति धारा)

भगवान कृष्ण की लीलाओं, उनके बाल रूप और माधुर्य भाव की उपासना इस धारा की विशेषता है।

  • सूरदास: ‘सूरसागर’ के रचयिता और अष्टछाप के प्रमुख कवि। उन्होंने वात्सल्य और श्रृंगार रस का अद्वितीय वर्णन किया।
  • मीराबाई: कृष्ण को अपना पति मानकर ‘माधुर्य भाव’ की पराकाष्ठा प्रदर्शित की।
  • चैतन्य महाप्रभु: बंगाल में संकीर्तन प्रथा की शुरुआत की और ‘गौड़ीय वैष्णव धर्म’ का प्रचार किया।
  • वल्लभाचार्य: ‘पुष्टिमार्ग’ के प्रणेता जिन्होंने कृष्ण के बाल स्वरूप की सेवा पर बल दिया।
  • रसखान: मुस्लिम होते हुए भी कृष्ण के अनन्य भक्त, जिन्होंने सवैयों के माध्यम से कृष्ण भक्ति का प्रचार किया।

भक्ति आंदोलन का बहुआयामी महत्व

भक्ति आंदोलन ने भारतीय समाज की वैचारिक नींव को हिला दिया और एक ऐसी नई चेतना का संचार किया जिसने तत्कालीन रूढ़ियों को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1. धार्मिक सरलीकरण और सुधार

  • पुरोहितवाद का अंत: भक्ति संतों ने ईश्वर और भक्त के बीच किसी मध्यस्थ (पंडित या मुल्ला) की आवश्यकता को नकारा। उन्होंने सीधे संवाद और व्यक्तिगत भक्ति पर बल दिया।
  • जटिल कर्मकांडों का विरोध: यज्ञ, बलि और कठिन उपवासों के स्थान पर ‘नाम-स्मरण’ और ‘कीर्तन’ को प्राथमिकता दी गई, जिससे धर्म आम आदमी के लिए सुलभ हो गया।
  • एकेश्वरवाद की स्थापना: कबीर और नानक जैसे संतों ने निर्गुण ब्रह्म की उपासना कर विभिन्न संप्रदायों के बीच की दूरियों को कम करने का प्रयास किया।

2. भाषाई और साहित्यिक क्रांति

इस आंदोलन का सबसे स्थायी प्रभाव क्षेत्रीय भाषाओं के विकास पर पड़ा। संतों ने जनसाधारण की भाषा में उपदेश दिए।

  • लोकभाषाओं का उत्थान: संस्कृत के एकाधिकार को चुनौती देते हुए हिंदी, बंगाली, मराठी, गुजराती, पंजाबी और तमिल जैसी भाषाओं में साहित्य सृजन हुआ।
  • कालजयी कृतियाँ: तुलसीदास की रामचरितमानस, सूरदास की सूरसागर और कबीर की बीजक जैसी रचनाओं ने न केवल साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि नैतिक मूल्यों को भी जन-जन तक पहुँचाया।

भक्ति आंदोलन के व्यापक सामाजिक प्रभाव

भक्ति आंदोलन केवल एक धार्मिक लहर नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक न्याय और समानता का एक महान मंच था।

1. जाति प्रथा और ऊंच-नीच पर कड़ा प्रहार

भक्ति संतों ने जाति आधारित भेदभाव को ईश्वर की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा माना।

क. सामाजिक समानता का संदेश:

रामानंद ने घोषणा की— “जाति-पाति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।” उन्होंने समाज के हर वर्ग के व्यक्ति को अपना शिष्य बनाया, जिसमें रैदास (चर्मकार), कबीर (जुलाहा), और सेना (नाई) शामिल थे।

ख. दलित और वंचित वर्गों का सशक्तिकरण:

भक्ति आंदोलन ने अस्पृश्य समझी जाने वाली जातियों को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की। संत रैदास और चोखामेला ने समाज को यह दिखाया कि भक्ति के मार्ग पर जाति का कोई स्थान नहीं है।

2. महिलाओं की स्थिति में सुधार और उनकी भागीदारी

मध्यकालीन समाज में जहाँ महिलाओं पर अनेक प्रतिबंध थे, भक्ति आंदोलन ने उन्हें अपनी आध्यात्मिक अभिव्यक्ति के लिए मंच प्रदान किया।

प्रमुख महिला संत और उनका योगदान:
  • मीराबाई: उन्होंने राजसी सुखों का त्याग कर कृष्ण भक्ति को चुना और पितृसत्तात्मक समाज की बेड़ियों को चुनौती दी।
  • अक्का महादेवी: दक्षिण भारत की इस वीरशैव संत ने सामाजिक लोकलाज को त्याग कर शिव की भक्ति की।
  • ललद्यद: कश्मीर की इस कवयित्री ने मानवतावादी और आध्यात्मिक चेतना का प्रसार किया।

3. हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय

भक्ति आंदोलन और सूफी आंदोलन ने मिलकर भारत में एक मिली-जुली संस्कृति (गंगा-जमुनी तहजीब) की नींव रखी।

  • साझा मूल्य: संतों ने दोनों धर्मों की बाहरी कुरीतियों (जैसे मूर्ति पूजा का विरोध या कट्टरता) पर प्रहार किया और प्रेम तथा भाईचारे पर बल दिया।
  • सांस्कृतिक एकता: कबीर के दोहे और गुरु नानक की शिक्षाओं ने दोनों समुदायों के बीच की खाई को पाटने का कार्य किया।

भक्ति आंदोलन के दार्शनिक आधार और उनकी सामाजिक प्रासंगिकता

आंदोलन को दो मुख्य विचारधाराओं में विभाजित किया जा सकता है, जिनका अपना-अपना सामाजिक महत्व था:

1. निर्गुण भक्ति धारा

यह विचारधारा निराकार ईश्वर में विश्वास करती थी। कबीर और नानक इसके प्रणेता थे।

  • इन्होंने सामाजिक रूढ़ियों पर सीधा और तीखा प्रहार किया।
  • बाह्य आडंबरों जैसे तीरथ, व्रत और तिलक का खंडन किया।
  • मानवतावाद को सर्वोपरि स्थान दिया।

2. सगुण भक्ति धारा

यह विचारधारा ईश्वर के साकार रूप (राम, कृष्ण आदि) की पूजा करती थी। तुलसीदास, सूरदास और चैतन्य महाप्रभु इसके मुख्य स्तंभ थे।

  • इन्होंने लोक-मंगल की भावना को बढ़ावा दिया।
  • तुलसीदास ने ‘रामराज्य’ की परिकल्पना के माध्यम से एक आदर्श समाज का ढांचा प्रस्तुत किया।
  • चैतन्य महाप्रभु ने बंगाल में कीर्तन के माध्यम से भक्ति को एक सामूहिक उत्सव का रूप दिया, जिससे ऊंच-नीच का भेद मिट गया।

भक्ति आंदोलन का राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव

भक्ति आंदोलन ने न केवल व्यक्तिगत शांति प्रदान की, बल्कि भारतीय मानस को राजनीतिक रूप से भी संगठित होने की प्रेरणा दी।

मनोवैज्ञानिक सुरक्षा:

विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में, भक्ति आंदोलन ने भारतीय जनता को आत्म-सम्मान और मानसिक शक्ति प्रदान की। इसने निराशा के वातावरण में आशा का संचार किया।

राजनीतिक चेतना:

महाराष्ट्र में समर्थ गुरु रामदास और अन्य संतों के उपदेशों ने मराठा शक्ति के उदय के लिए नैतिक आधार तैयार किया। इसी प्रकार, पंजाब में सिख संतों ने एक जुझारू और संगठित समाज की स्थापना की जो अत्याचार के विरुद्ध खड़ा हो सका।

शिक्षा का प्रसार:

भक्ति साहित्य ने अनपढ़ जनता को भी जीवन के उच्च दर्शन और नैतिकता से परिचित कराया। इसने अनौपचारिक शिक्षा के एक बड़े तंत्र के रूप में कार्य किया।

प्रमुख संतों के विशिष्ट सामाजिक योगदान

  • शंकरदेव (असम): उन्होंने ‘एकशरण धर्म’ का प्रचार किया और ‘नामघर’ (प्रार्थना घर) के माध्यम से सामुदायिक जीवन को मजबूत किया।
  • गुरु नानक देव: उन्होंने ‘लंगर’ (साझा रसोई) की परंपरा शुरू की, जिसने जाति और धर्म के भेदभाव को व्यावहारिक रूप से समाप्त करने का कार्य किया।
  • बसन्ना (कर्नाटक): उन्होंने ‘अनुभव मंटप’ की स्थापना की, जिसे विश्व की पहली लोकतांत्रिक संसदों में से एक माना जाता है, जहाँ सामाजिक और आध्यात्मिक चर्चाएँ होती थीं।
  • नरसी मेहता (गुजरात): उन्होंने ‘वैष्णव जन तो’ जैसे भजनों के माध्यम से दूसरों के दुखों को समझने और मानवता की सेवा करने का संदेश दिया।
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