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हिंदी साहित्य की नई कविता का विस्तृत अध्ययन।

नई कविता आधुनिक हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण काव्यधारा है जो प्रयोगवाद के बाद विकसित हुई। यह कविता को जीवन के अधिक निकट लाने, यथार्थ का चित्रण करने और लघुमानव की अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने पर केंद्रित थी।

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं समय सीमा

  • समयावधि: मुख्यतः 1954 के आसपास से मानी जाती है, जब जगदीश गुप्त, रामस्वरूप चतुर्वेदी और विजयदेव नारायण साही के संपादन में ‘नई कविता’ पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ। यह प्रयोगवाद की ही विकसित और परिष्कृत अवस्था मानी जाती है।
  • पूर्ववर्ती आंदोलनों से संबंध:
    • प्रयोगवाद से निरंतरता: नई कविता ने प्रयोगवाद की प्रयोगधर्मिता और बौद्धिकता को अपनाया, लेकिन उसकी अति-व्यक्तिवादिता और दुरूहता को कम किया।
    • प्रगतिवाद से भिन्नता: प्रगतिवाद की तरह सामाजिक यथार्थ पर बल दिया, लेकिन वर्ग-संघर्ष की संकीर्णता से मुक्त होकर जीवन के व्यापक यथार्थ को चित्रित किया।
  • स्वतंत्रता के बाद का परिदृश्य: देश की स्वतंत्रता के बाद की आशाओं और निराशाओं, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण तथा मानवीय संबंधों में आए बदलावों का प्रभाव।

2. नई कविता का अर्थ एवं स्वरूप

‘नई कविता’ का अर्थ केवल ‘नई’ नहीं था, बल्कि यह एक नवीन जीवन-दृष्टि और नवीन काव्य-दृष्टि को लेकर आई थी। इसमें जीवन की समग्रता को स्वीकार किया गया, जिसमें सुख-दुःख, आशा-निराशा, सौंदर्य-कुरूपता सभी शामिल थे।

  • अनुभूति की प्रामाणिकता: कवि की निजी और प्रामाणिक अनुभूतियों को महत्व दिया गया।
  • जीवन के प्रति आस्था: निराशा के बावजूद जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखने का प्रयास।
  • लघुमानव का चित्रण: साधारण व्यक्ति के जीवन, उसकी समस्याओं, आकांक्षाओं और संघर्षों को काव्य का विषय बनाया गया।
  • क्षण का महत्व: जीवन के प्रत्येक क्षण को महत्वपूर्ण माना गया और उसे गहराई से जिया गया।

3. नई कविता की प्रमुख विशेषताएँ

  • यथार्थवादी दृष्टिकोण: जीवन के कटु यथार्थ, विसंगतियों और संघर्षों का सीधा चित्रण।
  • लघुमानव की प्रतिष्ठा: आम आदमी के सुख-दुःख, उसकी दैनिक समस्याओं और उसकी पहचान को काव्य में स्थान।
  • अनुभूति की प्रामाणिकता: कवि की निजी और वास्तविक अनुभूतियों पर बल, बनावटीपन से दूरी।
  • बौद्धिकता और भावुकता का समन्वय: केवल भावना नहीं, बल्कि बुद्धि और विचार का भी समावेश।
  • क्षण बोध का महत्व: जीवन के हर पल को महत्वपूर्ण मानना और उसमें निहित सौंदर्य या पीड़ा को अभिव्यक्त करना।
  • नये बिंब, प्रतीक और उपमान: परंपरागत बिंबों के स्थान पर आधुनिक जीवन से जुड़े नए और मौलिक बिंबों का प्रयोग।
  • व्यंग्य और विडंबना: सामाजिक विसंगतियों और पाखंडों पर तीखा व्यंग्य।
  • मूल्य-बोध: मानवीय मूल्यों की खोज और उनकी स्थापना का प्रयास।

4. भाषा और शिल्प

  • बोलचाल की भाषा: संस्कृतनिष्ठता और दुरूहता से मुक्त होकर आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग, जिससे कविता अधिक सुगम बनी।
  • मुक्त छंद की प्रधानता: परंपरागत छंदों के बंधन से पूर्ण मुक्ति और मुक्त छंद का व्यापक प्रयोग।
  • नवीन बिंब और प्रतीक: शहरी जीवन, औद्योगिक वातावरण और आधुनिक तकनीक से जुड़े नए बिंबों का प्रयोग।
  • लाक्षणिकता और व्यंजना: भाषा में लाक्षणिकता और व्यंजना का प्रयोग, जिससे अर्थ की गहराई बढ़ाई जा सके।
  • शिल्पगत प्रयोगशीलता: कविता के रूप, संरचना और प्रस्तुति में नए-नए प्रयोग।

5. प्रमुख रचनाकार और उनकी रचनाएँ

  • भवानी प्रसाद मिश्र (1913-1985):
    • रचनाएँ: गीत फरोश, चकित है दुख, बुनी हुई रस्सी (साहित्य अकादमी पुरस्कार)।
    • विशेषताएँ: सहजता, सादगी, गांधीवादी विचार, दैनिक जीवन के अनुभव, ‘गीत फरोश’ में कवि की व्यावसायिक विवशता का चित्रण।
  • शमशेर बहादुर सिंह (1911-1993):
    • रचनाएँ: कुछ कविताएँ, कुछ और कविताएँ, चुका भी हूँ नहीं मैं।
    • विशेषताएँ: बिंबों का कवि, सौंदर्य बोध, उर्दू और हिंदी का समन्वय, जटिल शिल्प, ‘कवियों का कवि’ कहे जाते हैं।
  • कुँवर नारायण (1927-2017):
    • रचनाएँ: चक्रव्यूह, आत्मजयी (प्रबंध काव्य), अपने सामने, कोई दूसरा नहीं (ज्ञानपीठ पुरस्कार)।
    • विशेषताएँ: चिंतन प्रधान कविता, आधुनिक संवेदनशीलता, नैतिक मूल्य, मिथकों का आधुनिक संदर्भ में प्रयोग।
  • सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (1927-1983):
    • रचनाएँ: काठ की घंटियाँ, बाँस का पुल, एक सूनी नाव, खूँटियों पर टँगे लोग (साहित्य अकादमी पुरस्कार)।
    • विशेषताएँ: आम आदमी का दुख-दर्द, व्यंग्य, ग्रामीण जीवन का चित्रण, सहज और सरल भाषा।
  • केदारनाथ सिंह (1934-2018):
    • रचनाएँ: अभी बिल्कुल अभी, ज़मीन पक रही है, यहाँ से देखो, अकाल में सारस (साहित्य अकादमी पुरस्कार), उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ (ज्ञानपीठ पुरस्कार)।
    • विशेषताएँ: बिंबों की ताजगी, ग्रामीण परिवेश, मानवीय संवेदना, भाषा की सादगी।
  • विजयदेव नारायण साही (1924-1982):
    • रचनाएँ: मछलीघर, साखी।
    • विशेषताएँ: गहन बौद्धिकता, अस्तित्ववादी चिंतन, प्रेम और मृत्यु का बोध।
  • लक्ष्मीकांत वर्मा (1922-1977):
    • रचनाएँ: अतिचार, सीमांत के बादल।
    • विशेषताएँ: प्रयोगशीलता, आधुनिकता बोध।

6. नई कविता का साहित्यिक योगदान और प्रभाव

  • कविता का लोकव्यापीकरण: इसे आम आदमी की भाषा और भावनाओं के करीब लाकर उसे अधिक सुगम और प्रासंगिक बनाया।
  • यथार्थ का व्यापक चित्रण: जीवन के हर छोटे-बड़े पहलू को बिना किसी आदर्शवाद या अति-काल्पनिकता के चित्रित किया।
  • भाषा और शिल्प का नवोन्मेष: बोलचाल की भाषा, मुक्त छंद और नए बिंबों के प्रयोग से काव्य-शिल्प को नया आयाम दिया।
  • व्यक्ति और समाज का संतुलन: व्यक्तिगत अनुभूतियों के साथ-साथ सामाजिक चेतना को भी महत्व दिया।
  • आधुनिक संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति: शहरी जीवन की जटिलताओं, अकेलेपन और मानवीय संबंधों में आए बदलावों को गहराई से अभिव्यक्त किया।

निष्कर्ष

नई कविता हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसने कविता को जीवन के यथार्थ से जोड़ा और उसे आधुनिक संवेदनशीलता से संपन्न किया। इसने हिंदी काव्य को एक नई दिशा दी और आज भी इसका प्रभाव समकालीन कविता पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।



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