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गोस्वामी तुलसीदास: जीवन परिचय, प्रमुख साहित्यिक रचनाएँ

गोस्वामी तुलसीदास: जीवन परिचय, रचनाएँ और उपलब्धियाँ | Gyan Pragya

गोस्वामी तुलसीदास: जीवन परिचय

गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल की सगुण धारा के अंतर्गत रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि माने जाते हैं। उन्होंने समाज में राम के आदर्श चरित्र को स्थापित कर लोक-कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।

जन्म और बचपन

तुलसीदास का जन्म 1511 ईस्वी (विक्रम संवत 1568) के आसपास उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था।

  • तुलसीदास का बचपन का नाम रामबोला था।
  • कहा जाता है कि वे अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्मे थे, जिसके कारण उनके माता-पिता ने उन्हें त्याग दिया था।
  • उनका पालन-पोषण दासी चुनिया ने किया और बाद में उन्हें दीक्षा गुरु नरहरिदास का संरक्षण प्राप्त हुआ।

शिक्षा और वैराग्य

तुलसीदास ने वाराणसी में शेष सनातन जी के पास रहकर वेदों, पुराणों और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। उनका विवाह रत्नावली से हुआ था। जनश्रुति के अनुसार, अपनी पत्नी के प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण एक बार पत्नी द्वारा दी गई फटकार ने उन्हें वैराग्य की ओर प्रेरित किया।

प्रमुख साहित्यिक रचनाएँ

तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं का प्रयोग किया है। उनकी कुल 12 प्रामाणिक रचनाएँ मानी जाती हैं:

अवधी भाषा की रचनाएँ

  • रामचरितमानस: यह तुलसीदास की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय कृति है।
  • जानकी मंगल
  • पार्वती मंगल
  • बरवै रामायण
  • रामलला नहछू

ब्रज भाषा की रचनाएँ

  • विनय पत्रिका: भक्ति रस से ओत-प्रोत पद।
  • कवितावली: कवित्त और सवैया छंदों में रचित।
  • गीतावली
  • दोहावली
  • कृष्ण गीतावली
  • वैराग्य संदीपनी

रामचरितमानस: एक दृष्टि

रामचरितमानस की रचना 1574 ईस्वी (संवत 1631) में प्रारंभ हुई थी। इसे पूर्ण करने में लगभग 2 वर्ष 7 माह 26 दिन का समय लगा था। यह ग्रंथ 7 कांडों में विभाजित है:

  • 1. बालकांड (सबसे बड़ा कांड)
  • 2. अयोध्याकांड (मानस का हृदय स्थल)
  • 3. अरण्यकांड
  • 4. किष्किंधाकांड
  • 5. सुंदरकांड
  • 6. लंकाकांड
  • 7. उत्तरकांड

काव्यगत विशेषताएँ और दर्शन

तुलसीदास का साहित्य लोक-मंगल की भावना से परिपूर्ण है। उन्होंने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में चित्रित किया।

समन्वय की भावना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तुलसीदास को समन्वय का कवि कहा है। उन्होंने शैव और वैष्णव, ज्ञान और भक्ति, तथा सगुण और निर्गुण के बीच समन्वय स्थापित किया।

रस और अलंकार

उनकी रचनाओं में शांत रस मुख्य है, किंतु वीर, श्रृंगार और वात्सल्य रसों का भी सुंदर समावेश मिलता है। अनुप्रास, उपमा और रूपक उनके प्रिय अलंकार हैं।

मृत्यु

गोस्वामी तुलसीदास का निधन 1623 ईस्वी (विक्रम संवत 1680) में वाराणसी के असी घाट पर हुआ था। उनकी मृत्यु के संबंध में यह दोहा प्रसिद्ध है:
“संवत सोरह सौ असी, असी गंग के तीर। सावन सुकला सप्तमी, तुलसी तज्यो सरीर॥”

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