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रफी उल-दरजात और रफ़ी उद-दौलत (Rafi Ul-Darjat and Rafi Ud-Daulat)

फर्रुखसियर के अपदस्थ होने के बाद, सैयद बंधुओं ने दो युवा राजकुमारों को एक के बाद एक मुगल सिंहासन पर बैठाया। ये दोनों शासक अत्यंत अल्पकालिक रहे और पूरी तरह से सैयद बंधुओं के नियंत्रण में थे, जो उत्तर मुगल काल में शाही सत्ता के पूर्ण पतन को दर्शाते हैं।

1. रफी उल-दरजात (Rafi Ul-Darjat) (28 फरवरी – 4 जून 1719 ईस्वी)

  • राज्याभिषेक: फर्रुखसियर को अपदस्थ करने के बाद, सैयद बंधुओं ने 28 फरवरी 1719 ईस्वी को रफी उल-दरजात को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया।
  • वंश: वह बहादुर शाह प्रथम के पुत्र रफी-उस-शान का पुत्र था।
  • शासनकाल: उसका शासनकाल मात्र 98 दिनों का था, जो मुगल इतिहास में सबसे छोटा शासनकाल है।
  • सैयद बंधुओं का प्रभाव: वह पूरी तरह से सैयद बंधुओं के हाथों की कठपुतली था। सभी महत्वपूर्ण निर्णय सैयद बंधुओं द्वारा लिए जाते थे।
  • स्वास्थ्य और मृत्यु:
    • वह फेफड़ों की बीमारी (क्षय रोग) से पीड़ित था।
    • 4 जून 1719 ईस्वी को उसकी मृत्यु हो गई।
  • विद्रोह: उसके शासनकाल में आगरा में निकुसियर नामक एक अन्य राजकुमार ने खुद को बादशाह घोषित कर दिया था, लेकिन इस विद्रोह को दबा दिया गया।

2. रफी उद-दौलत (Rafi Ud-Daulat) (6 जून – 17 सितंबर 1719 ईस्वी)

रफी उल-दरजात की मृत्यु के बाद, सैयद बंधुओं ने उसके भाई को सिंहासन पर बैठाया।

  • राज्याभिषेक: रफी उल-दरजात की मृत्यु के दो दिन बाद, 6 जून 1719 ईस्वी को सैयद बंधुओं ने उसके बड़े भाई रफी उद-दौलत को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया।
  • उपाधि: उसने ‘शाहजहाँ द्वितीय’ की उपाधि धारण की।
  • शासनकाल: उसका शासनकाल भी अत्यंत अल्पकालिक रहा, मात्र 3 महीने और 11 दिन।
  • सैयद बंधुओं का प्रभाव: वह भी अपने भाई की तरह सैयद बंधुओं के पूर्ण नियंत्रण में था।
  • स्वास्थ्य और मृत्यु:
    • वह भी क्षय रोग से पीड़ित था।
    • 17 सितंबर 1719 ईस्वी को उसकी मृत्यु हो गई।

3. निष्कर्ष (Conclusion)

रफी उल-दरजात और रफी उद-दौलत का शासनकाल मुगल साम्राज्य के इतिहास में शाही सत्ता के पूर्ण क्षरण और सैयद बंधुओं की ‘किंगमेकर’ की शक्ति का स्पष्ट प्रमाण है। इन दोनों शासकों की अल्पायु और बीमारी से मृत्यु ने मुगल सिंहासन को और अस्थिर कर दिया, जिससे केंद्रीय सत्ता और कमजोर होती चली गई। यह वह दौर था जब मुगल बादशाह केवल नाममात्र के शासक रह गए थे और वास्तविक शक्ति दरबार के शक्तिशाली अमीरों के हाथों में केंद्रित हो गई थी।

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