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ब्रिटिश शासन (British Rule)

उत्तराखंड में गोरखा शासन के अंत के बाद ब्रिटिश शासन का सूत्रपात हुआ। आंग्ल-नेपाल युद्ध (1814-16) और सुगौली की संधि (1815/16) के परिणामस्वरूप उत्तराखंड का अधिकांश भाग ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया, जबकि टिहरी रियासत को पंवार शासकों को सौंप दिया गया, जो ब्रिटिश प्रभुसत्ता के अधीन रही।

कुछ त्वरित तथ्य (Quick Facts):
  • ब्रिटिश शासन उत्तराखंड में 1815 से 1947 तक रहा।
  • प्रशासनिक सुविधा के लिए क्षेत्र को कुमाऊँ कमिश्नरी के अंतर्गत रखा गया।
  • ब्रिटिश काल में कई प्रशासनिक, भू-राजस्व, वन और ढांचागत सुधार हुए, जिनका क्षेत्र पर दूरगामी प्रभाव पड़ा।
  • टिहरी रियासत ब्रिटिश संरक्षण में एक स्वतंत्र राज्य के रूप में बनी रही।

ब्रिटिश कुमाऊँ की स्थापना और प्रशासन

  • 27 अप्रैल 1815 को कर्नल गार्डनर और गोरखा शासक बमशाह के बीच हुई संधि के तहत कुमाऊँ अंग्रेजों को सौंपा गया।
  • ई. गार्डनर को कुमाऊँ का प्रथम कमिश्नर नियुक्त किया गया।
  • प्रारंभ में कुमाऊँ कमिश्नरी में कुमाऊँ जनपद और देहरादून शामिल थे। 1839 में ब्रिटिश गढ़वाल जनपद का गठन किया गया, जिसका मुख्यालय श्रीनगर और बाद में पौड़ी (1840) बनाया गया।
  • 1891 में कुमाऊँ कमिश्नरी को अल्मोड़ा और नैनीताल दो जिलों में विभाजित किया गया। नैनीताल को कमिश्नरी का मुख्यालय बनाया गया।
  • 1892 में तराई जिले को नैनीताल में मिला दिया गया।

प्रमुख ब्रिटिश कमिश्नर और उनके कार्य

1. ई. गार्डनर (E. Gardner) (1815-1816)

  • कुमाऊँ के प्रथम कमिश्नर।
  • इनके समय में अल्मोड़ा से श्रीनगर तक डाक व्यवस्था लागू की गई।

2. विलियम ट्रेल (William Traill) (1816-1835)

  • कुमाऊँ के वास्तविक कमिश्नर और अत्यंत लोकप्रिय प्रशासक।
  • 1816 में अल्मोड़ा जेल की स्थापना।
  • 1819 में पटवारी पद का सृजन किया (9 पटवारी)।
  • 1821 में आबकारी विभाग की स्थापना।
  • 1822 में कुमाऊँ में खच्चर सेना की स्थापना।
  • 1823 में 80 साला भूमि बंदोबस्त कराया, जो वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित था।
  • 1824 में डबल लॉक व्यवस्था (कोषागार में) लागू की।
  • 1829 में नदियों पर लोहे के सस्पेंशन पुलों का निर्माण शुरू करवाया।
  • 1830 में देसी चिकित्सकों की नियुक्ति।
  • इनके शासनकाल को “न वकील, न अपील, न दलील” का शासन कहा जाता था, क्योंकि वे त्वरित न्याय करते थे।

3. कर्नल गोयन (Colonel Gowan) (1836-1838)

  • इनके समय में दास प्रथा का अंत हुआ।
  • बच्चों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाई।

4. जॉर्ज थॉमस लूशिंगटन (George Thomas Lushington) (1838-1848)

  • नैनीताल नगर पालिका के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका।
  • 1841 में नैनीताल की खोज (पी. बैरन द्वारा) इनके समय में हुई।
  • तराई भाबर के विकास पर ध्यान दिया।

5. जॉन हैलिट बैटन (John Hallett Batten) (1848-1856)

  • 1854 में शिक्षा विभाग की स्थापना।
  • इनके समय में गंग नहर का निर्माण कार्य (1842-54) पूर्ण हुआ।
  • वैज्ञानिक पद्धति से भूमि बंदोबस्त कराया, जिसे “बैटन सेटलमेंट” कहा जाता है।

6. सर हेनरी रैमजे (Sir Henry Ramsay) (1856-1884)

  • कुमाऊँ के सबसे लोकप्रिय कमिश्नर, जिन्हें “कुमाऊँ का बेताज बादशाह” और “रामजी साहब” कहा जाता था।
  • इनका कार्यकाल ब्रिटिश कुमाऊँ का स्वर्णकाल माना जाता है।
  • 1857 के विद्रोह के समय कुमाऊँ में शांति बनाए रखी।
  • वन संरक्षण और प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया। 1861 में वन बंदोबस्त।
  • तराई भाबर के विकास के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए, नहरों का निर्माण।
  • नैनीताल को ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में विकसित किया।
  • आपदा प्रबंधन के लिए नियम बनाए। 1867 में हिल साइड सेफ्टी कमेटी का गठन।
  • शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कार्य किए।

ब्रिटिश कालीन भू-राजस्व और वन व्यवस्था

भूमि बंदोबस्त

  • अंग्रेजों ने गढ़वाल में 11 और कुमाऊँ में भी लगभग इतने ही भूमि बंदोबस्त किए।
  • ट्रेल का 80 साला बंदोबस्त (1823): यह पहला महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक बंदोबस्त था।
  • बैटन का बंदोबस्त (लगभग 1840-44): इसे 20 साला बंदोबस्त भी कहते हैं।
  • विकेट का बंदोबस्त (1863-73): यह वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित पहला बंदोबस्त था, जिसमें भूमि को 5 वर्गों में बांटा गया।
  • इबर्टसन का अंतिम बंदोबस्त (1928): ब्रिटिश काल का अंतिम महत्वपूर्ण बंदोबस्त।

वन व्यवस्था

  • 1826 में ट्रेल ने साल वनों की कटाई पर रोक लगाई।
  • 1858 में रैमजे ने ठेकेदारी प्रथा बंद की।
  • 1864 में भारतीय वन विभाग की स्थापना हुई। डिट्रिच ब्रैंडिस पहले वन महानिरीक्षक बने।
  • 1878 में भारतीय वन अधिनियम पारित हुआ, जिससे वनों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा।
  • 1893 में सभी बेनाप भूमि को संरक्षित वन घोषित किया गया।
  • 1911-17 में वन बंदोबस्त हुए, जिससे जनता के वन अधिकार सीमित हुए और कुमाऊँ में वन आंदोलन हुए।
  • 1931 में वन पंचायतों का गठन हुआ।

ब्रिटिश काल में ढांचागत विकास

  • सड़कें: पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों का जाल बिछाया गया, जैसे श्रीनगर-कर्णप्रयाग सड़क, अल्मोड़ा-रानीखेत सड़क।
  • रेलवे: 1884 में रामपुर से काठगोदाम तक, 1896 में लक्सर से हरिद्वार तक, 1900 में हरिद्वार से देहरादून तक रेल लाइन का विस्तार हुआ।
  • डाक और तार: संचार व्यवस्था को सुदृढ़ किया गया।
  • शिक्षा: कई स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना हुई, जैसे रैमजे कॉलेज (अल्मोड़ा)।
  • स्वास्थ्य: डिस्पेंसरियों और अस्पतालों की स्थापना।

टिहरी रियासत (ब्रिटिश काल में)

  • गोरखा युद्ध के बाद सुदर्शन शाह को अंग्रेजों ने टिहरी रियासत का राजा बनाया (अलकनंदा और मंदाकिनी के पश्चिम का भाग)।
  • टिहरी रियासत ब्रिटिश प्रभुसत्ता के अधीन एक संरक्षित राज्य थी।
  • शासकों ने अंग्रेजों के साथ संधियाँ कीं और उनके प्रति निष्ठावान रहे।
  • प्रताप शाह, कीर्ति शाह, नरेन्द्र शाह जैसे शासकों ने शिक्षा, वन प्रबंधन और प्रशासन में सुधार किए।
  • श्रीदेव सुमन जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने टिहरी रियासत में राजशाही के विरुद्ध और प्रजामंडल आंदोलन का नेतृत्व किया।
  • 1 अगस्त 1949 को टिहरी रियासत का भारत में विलय हो गया।

निष्कर्ष (Conclusion)

उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन ने प्रशासनिक एकीकरण, ढांचागत विकास और कुछ सामाजिक सुधार तो किए, लेकिन इसके साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और स्थानीय लोगों के पारंपरिक अधिकारों का हनन भी हुआ। वन प्रबंधन नीतियों के कारण कई वन आंदोलन हुए। ब्रिटिश काल ने क्षेत्र की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संरचना पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला, जिसके परिणामस्वरूप स्वतंत्रता संग्राम की भावना भी प्रबल हुई।

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