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कबीर दास: जीवन परिचय

कबीर दास: जीवन परिचय, रचनाएँ और उपलब्धियाँ | Gyan Pragya

कबीर दास: जीवन परिचय

कबीर दास भक्ति काल की निर्गुण संत परंपरा के सबसे प्रभावशाली और क्रांतिकारी कवि थे। उनका जन्म 1398 ईस्वी (विक्रम संवत 1455) में काशी (वाराणसी) में हुआ था। जनश्रुतियों के अनुसार, उन्हें लहरतारा ताल के पास पाया गया था, जहाँ से नीरु और नीमा नामक जुलाहा दंपत्ति ने उनका पालन-पोषण किया।

गुरु और शिक्षा

कबीर ने प्रसिद्ध वैष्णव संत स्वामी रामानंद को अपना गुरु बनाया था। कबीर अनपढ़ थे, जिसका प्रमाण उनकी इस पंक्ति से मिलता है: “मसि कागद छूयो नहीं, कलम गह्यो नहिं हाथ”। उन्होंने साधु-संगति और अनुभवों से ज्ञान प्राप्त किया था।

साहित्यिक कृतियाँ

कबीर की वाणियों का संग्रह उनके शिष्य धर्मदास ने 1464 ईस्वी में बीजक के नाम से किया था। बीजक के मुख्य रूप से तीन भाग हैं:

  • साखी: यह संस्कृत के ‘साक्षी’ शब्द का तद्भव रूप है। इसमें कबीर के सिद्धांतों और उपदेशों का वर्णन दोहा छंद में किया गया है।
  • सबद (पद): यह गेय पद हैं जिनमें कबीर के आध्यात्मिक प्रेम और साधना की अभिव्यक्ति हुई है।
  • रमैनी: यह चौपाई और दोहा छंद में रचित है, जिसमें कबीर के दार्शनिक विचारों का समावेश है।

भाषा और शैली

सधुक्कड़ी और पंचमेल खिचड़ी

कबीर की भाषा को विद्वानों ने सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी कहा है। उनकी भाषा में अवधी, भोजपुरी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, अरबी और फारसी के शब्दों का मिश्रण मिलता है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर को वाणी का डिक्टेटर कहा है।

वैचारिक दर्शन और समाज सुधार

निर्गुण ब्रह्म की उपासना

कबीर निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासक थे। वे मूर्ति पूजा, अवतारवाद और कर्मकांड के घोर विरोधी थे। उन्होंने ईश्वर को प्रत्येक जीव के भीतर व्याप्त माना है।

सामाजिक कुरीतियों का विरोध

  • जातिवाद का खंडन: कबीर ने समाज में व्याप्त ऊंच-नीच और जाति व्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया।
  • सांप्रदायिक एकता: उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों में व्याप्त बाह्याडंबरों की आलोचना की और मानवता को सर्वोपरि माना।
  • पाखंड का विरोध: तिलक, छापा, माला और मुंडन जैसे प्रदर्शनों को उन्होंने व्यर्थ बताया।

महाप्रयाण (मृत्यु)

कबीर ने अपने जीवन का अंतिम समय मगहर (गोरखपुर) में बिताया। तत्कालीन मान्यता थी कि काशी में मरने पर स्वर्ग और मगहर में मरने पर नरक मिलता है। इस अंधविश्वास को तोड़ने के लिए वे मगहर चले गए और 1518 ईस्वी (विक्रम संवत 1575) में वहीं प्राण त्यागे।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • कबीर सिकंदर लोदी के समकालीन थे।
  • कबीर की पंक्तियाँ सिक्खों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित हैं।
  • उनकी कविताओं में उलटबाँसियाँ (विपरीतार्थक शैली) विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
  • कबीर को ज्ञानमार्गी शाखा का प्रतिनिधि कवि माना जाता है।
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