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फर्रुख़ सियर (Farrukhsiyar)

फर्रुखसियर, मुगल साम्राज्य का नौवां शासक था। उसका शासनकाल (1713-1719 ईस्वी) सैयद बंधुओं के अत्यधिक प्रभाव और उनकी ‘किंगमेकर’ की भूमिका के लिए जाना जाता है, जिसने मुगल शाही सत्ता को और कमजोर कर दिया।

1. प्रारंभिक जीवन और राज्याभिषेक (Early Life and Accession)

  • जन्म: 20 अगस्त 1685 ईस्वी को औरंगाबाद में।
  • पिता: अज़ीम-उस-शान (बहादुर शाह प्रथम का पुत्र)।
  • उत्तराधिकार का संघर्ष: अपने पिता की मृत्यु और जहांदार शाह के सिंहासन पर बैठने के बाद, फर्रुखसियर ने मुगल सिंहासन पर दावा किया।
  • सैयद बंधुओं का समर्थन: उसे सैयद बंधुओं – सैयद हुसैन अली खान (मीर बख्शी) और सैयद अब्दुल्ला खान (वजीर) – का महत्वपूर्ण समर्थन प्राप्त था।
  • आगरा का युद्ध (1713 ईस्वी): सैयद बंधुओं की सहायता से, फर्रुखसियर ने जहांदार शाह को पराजित किया और मार डाला।
  • राज्याभिषेक: 1713 ईस्वी में वह दिल्ली की गद्दी पर बैठा।

2. सैयद बंधुओं का प्रभाव (Influence of the Sayyid Brothers)

फर्रुखसियर का शासनकाल पूरी तरह से सैयद बंधुओं के नियंत्रण में था, जिन्हें ‘किंगमेकर’ कहा जाता था।

  • सत्ता का केंद्र: सैयद बंधु (सैयद हुसैन अली खान और सैयद अब्दुल्ला खान) साम्राज्य के वास्तविक शासक बन गए थे।
  • फर्रुखसियर की कमजोर स्थिति: फर्रुखसियर एक कमजोर और अयोग्य शासक था, जो सैयद बंधुओं के प्रभाव से मुक्त होना चाहता था, लेकिन सफल नहीं हो सका।
  • अमीरों में गुटबाजी: सैयद बंधुओं के बढ़ते प्रभाव के कारण दरबार में अन्य गुटों (जैसे तुरानी और ईरानी) के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता बढ़ गई।

3. नीतियां और प्रशासन (Policies and Administration)

फर्रुखसियर के शासनकाल में भी मुगल प्रशासन में गिरावट जारी रही।

  • जजिया कर की पुनः स्थापना और उन्मूलन:
    • फर्रुखसियर ने जजिया कर को पुनः लागू किया, लेकिन सैयद बंधुओं के दबाव के कारण इसे जल्द ही समाप्त कर दिया गया।
  • जागीरदारी संकट: जागीरदारी संकट और मनसबदारी प्रणाली की समस्याएँ और बढ़ गईं, जिससे प्रशासन में अस्थिरता आई।
  • राजपूत और मराठा नीति:
    • सैयद बंधुओं ने राजपूतों और मराठों के प्रति सुलह-सफाई की नीति अपनाई।
    • उन्होंने मारवाड़ के अजीत सिंह को गुजरात का गवर्नर नियुक्त किया और उनसे विवाह संबंध स्थापित किए।
    • मराठा शासक शाहू को दक्कन में चौथ और सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार दिया गया, जिसके बदले में उन्हें मुगलों को सैन्य सहायता देनी थी।
  • अंग्रेजों को व्यापारिक रियायतें (1717 ईस्वी):
    • फर्रुखसियर ने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक फरमान जारी किया, जिसे ‘मैग्ना कार्टा ऑफ द कंपनी’ कहा जाता है।
    • इस फरमान ने कंपनी को बंगाल में शुल्क मुक्त व्यापार करने का अधिकार दिया, जिससे मुगल राजस्व को भारी नुकसान हुआ और अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ा।

4. संघर्ष और पतन (Conflicts and Downfall)

फर्रुखसियर और सैयद बंधुओं के बीच अविश्वास और संघर्ष अंततः उसके पतन का कारण बना।

  • फर्रुखसियर सैयद बंधुओं के प्रभाव से मुक्त होना चाहता था और उसने उन्हें हटाने के कई प्रयास किए, लेकिन वह सफल नहीं हो सका।
  • सैयद बंधुओं ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए मराठा पेशवा बालाजी विश्वनाथ और मारवाड़ के अजीत सिंह जैसे क्षेत्रीय शक्तियों के साथ गठबंधन किया।
  • सैयद बंधुओं द्वारा फर्रुखसियर का अपदस्थ करना: 1719 ईस्वी में, सैयद बंधुओं ने फर्रुखसियर को कैद कर लिया, अंधा कर दिया और बाद में मार डाला।
  • यह घटना मुगल इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी, क्योंकि यह पहली बार था जब किसी बादशाह को उसके ही अमीरों द्वारा अपदस्थ और मार डाला गया था।

5. मृत्यु और विरासत (Death and Legacy)

  • मृत्यु: 19 अप्रैल 1719 ईस्वी को सैयद बंधुओं के आदेश पर।
  • विरासत:
    • फर्रुखसियर का शासनकाल मुगल साम्राज्य के तेजी से पतन और शाही सत्ता के कमजोर होने का प्रतीक था।
    • सैयद बंधुओं की ‘किंगमेकर’ की भूमिका ने यह स्थापित कर दिया कि अब मुगल सिंहासन पर बैठने के लिए व्यक्तिगत योग्यता या वंश से अधिक अमीरों का समर्थन महत्वपूर्ण था।
    • अंग्रेजों को दी गई व्यापारिक रियायतों ने भारत में ब्रिटिश प्रभाव को और मजबूत किया, जिससे भविष्य में मुगल साम्राज्य के लिए बड़ी चुनौतियाँ पैदा हुईं।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

फर्रुखसियर का शासनकाल मुगल साम्राज्य के इतिहास में एक अंधेरा अध्याय था। उसकी अयोग्यता और सैयद बंधुओं पर अत्यधिक निर्भरता ने शाही प्रतिष्ठा को धूमिल किया और साम्राज्य को आंतरिक रूप से कमजोर कर दिया। उसके हिंसक अंत ने यह स्पष्ट कर दिया कि मुगल बादशाह अब केवल अमीरों के हाथों की कठपुतली बन गए थे, जिससे साम्राज्य के अंतिम पतन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

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