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बद्री दत्त पांडे-जीवन परिचय और रचनाएँ

बद्री दत्त पांडे का जीवन परिचय, रचनाएँ एवं साहित्यिक योगदान | Gyan Pragya

बद्री दत्त पांडे: कुमाऊँ केसरी का जीवन परिचय

बद्री दत्त पांडे (1882 – 1965) भारत के एक महान स्वतंत्रता सेनानी, अनुभवी पत्रकार और समाज सुधारक थे। उन्हें मुख्य रूप से उत्तराखंड में “कुली-बेगार प्रथा” के विरुद्ध सफल आंदोलन का नेतृत्व करने और “कुमाऊँ का इतिहास” लिखने के लिए जाना जाता है। उनके अदम्य साहस और नेतृत्व क्षमता के कारण उन्हें “कुमाऊँ केसरी” की उपाधि दी गई थी।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

  • जन्म: बद्री दत्त पांडे का जन्म 15 फरवरी 1882 को हरिद्वार के कनखल में हुआ था।
  • मूल निवास: उनका मूल निवास स्थान उत्तराखंड का अल्मोड़ा जिला था।
  • शिक्षा: उनकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई, जिसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और सरकारी सेवा में भी कुछ समय तक कार्य किया, जिसे बाद में उन्होंने देश सेवा के लिए त्याग दिया।

पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान

बद्री दत्त पांडे ने पत्रकारिता को जन-जागरूकता का माध्यम बनाया। उन्होंने ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध अपनी कलम का प्रभावी प्रयोग किया।

1. अल्मोड़ा अखबार (Almora Akhbar)

1913 में वे “अल्मोड़ा अखबार” के संपादक बने। उनके संपादक बनते ही अखबार का स्वर अत्यंत उग्र और राष्ट्रवादी हो गया। 1918 में ब्रिटिश सरकार ने इस अखबार पर प्रतिबंध लगा दिया।

2. शक्ति साप्ताहिक (Shakti Weekly)

अल्मोड़ा अखबार बंद होने के बाद, उन्होंने 15 सितंबर 1918 को “शक्ति” नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इसके माध्यम से उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई।

कुली-बेगार आंदोलन का नेतृत्व

बद्री दत्त पांडे के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि उत्तराखंड से कुली-बेगार प्रथा का अंत करना था।

  • आंदोलन की तिथि: 13-14 जनवरी 1921 (मकर संक्रांति के अवसर पर)।
  • स्थान: बागेश्वर में सरयू और गोमती नदियों के संगम पर।
  • घटना: उनके नेतृत्व में हजारों ग्रामीणों ने कुली-बेगार से संबंधित रजिस्टरों को सरयू नदी में प्रवाहित कर दिया और प्रतिज्ञा ली कि वे अब कभी बेगार नहीं करेंगे।
  • परिणाम: इस सफल अहिंसक आंदोलन के बाद ब्रिटिश सरकार को इस दमनकारी प्रथा को समाप्त करना पड़ा। इसी आंदोलन की सफलता के बाद उन्हें “कुमाऊँ केसरी” कहा जाने लगा।

राजनीतिक जीवन और स्वतंत्रता संग्राम

पांडे जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे और उन्होंने कई बार जेल यात्राएं कीं।

  • वे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कुल पांच बार जेल गए।
  • 1937 में वे संयुक्त प्रांत (United Provinces) की काउंसिल के सदस्य चुने गए।
  • भारत की स्वतंत्रता के बाद, 1955 में वे अल्मोड़ा निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा सांसद (MP) चुने गए।

साहित्यिक योगदान: कुमाऊँ का इतिहास

जब बद्री दत्त पांडे जेल में थे, तब उन्होंने उत्तराखंड के इतिहास पर व्यापक शोध किया।

  • उनकी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक “कुमाऊँ का इतिहास” है, जो 1937 में प्रकाशित हुई थी।
  • यह पुस्तक उत्तराखंड के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं को समझने के लिए आज भी एक प्रामाणिक ग्रंथ मानी जाती है।

निधन और विरासत

बद्री दत्त पांडे का निधन 13 जनवरी 1965 को हुआ। वे उत्तराखंड के पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने क्षेत्रीय समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया और गांधीवादी विचारधारा के साथ मिलकर स्थानीय शोषण का अंत किया। उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया गया है।

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