गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’: एक संक्षिप्त परिचय
गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ उत्तराखंड के एक प्रख्यात लोक गायक, कवि, नाटककार और जन-आंदोलनकारी थे। उन्हें “जन-कवि” के रूप में जाना जाता है क्योंकि उनकी रचनाएं और गीत सीधे आम जनता की समस्याओं और संघर्षों से जुड़े थे।
प्रारंभिक जीवन और जन्म
- जन्म तिथि: 10 सितंबर 1945।
- जन्म स्थान: अल्मोड़ा जिले का ज्योली गांव (हवालबाग ब्लॉक), उत्तराखंड।
- पिता का नाम: हंसा दत्त तिवारी और माता का नाम जीवंती देवी था।
- गिर्दा की प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा और नैनीताल में हुई, लेकिन उन्होंने औपचारिक शिक्षा से अधिक ज्ञान समाज और लोक अनुभवों से प्राप्त किया।
प्रमुख सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन
गिर्दा केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि वे उत्तराखंड के लगभग हर बड़े सामाजिक आंदोलन के अग्रदूत रहे। उन्होंने अपने गीतों को प्रतिरोध का हथियार बनाया।
1. उत्तराखंड राज्य प्राप्ति आंदोलन
पृथक उत्तराखंड राज्य के निर्माण के लिए चले लंबे संघर्ष में गिर्दा ने अपनी कविताओं और गीतों के माध्यम से जनचेतना जगाई। उनका गीत “जैंता एक दिन तो आलो, उ दिन यो दुनीं में” (एक दिन वह दिन आएगा, जब दुनिया में न्याय होगा) आंदोलनकारियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना।
2. चिपको आंदोलन
पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रसिद्ध चिपको आंदोलन में गिर्दा ने सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने वनों के अंधाधुंध कटान के विरुद्ध लोगों को एकजुट किया।
3. नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन
उत्तराखंड में शराब के बढ़ते प्रचलन के विरुद्ध उन्होंने “नशा नहीं रोजगार दो” नारे के साथ व्यापक जन अभियान चलाया।
साहित्यिक और कलात्मक योगदान
प्रमुख काव्य रचनाएं और नाटक
- शिखरों के स्वर: कुमाऊँनी कविताओं का महत्वपूर्ण संग्रह।
- हमारी कविता के आखर: उनकी साहित्यिक विचारधारा को दर्शाने वाली कृति।
- नगाड़े खामोश हैं: प्रसिद्ध नाटक, जिसमें व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया गया है।
- धनुष यज्ञ: लोक शैली पर आधारित एक महत्वपूर्ण नाट्य मंचन।
लोकप्रिय गीत
गिर्दा ने कुमाऊँनी और हिंदी दोनों भाषाओं में लेखन किया। उनके कुछ सबसे चर्चित गीत निम्नलिखित हैं:
- “हुम लड्यां छां, हुम लड़बे” (हम लड़े हैं, हम लड़ेंगे)।
- “आज हिमालय तू जगी कछौ” (आज हिमालय तू जाग उठा है)।
- “उत्तराखंड काव्य” – जिसमें उत्तराखंड की पीड़ा और गौरव का वर्णन है।
महत्वपूर्ण तथ्य और विरासत
- गिर्दा को “उत्तराखंड का कबीर” भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने सामाजिक बुराइयों और पाखंड पर कड़ा प्रहार किया।
- वे नैनीताल में स्थित “झुप्पा” और “जन चेतना” जैसे सांस्कृतिक संगठनों से गहरे जुड़े थे।
- गिर्दा ने आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिए भी कई लोक आधारित कार्यक्रमों का निर्देशन किया।
- निधन: 22 अगस्त 2010 को हल्द्वानी में उनका निधन हुआ।
- उनके सम्मान में आज भी उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में ‘गिर्दा स्मृति उत्सव’ आयोजित किए जाते हैं।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
- गिर्दा का वास्तविक नाम: गिरीश तिवारी।
- मुख्य उपनाम: गिर्दा, जन-कवी।
- प्रमुख आंदोलन: चिपको, शराब विरोधी, राज्य आंदोलन।
- प्रसिद्ध नाटक: नगाड़े खामोश हैं, धनुष यज्ञ, अंधेर नगरी (रूपांतरण)।
- प्रसिद्ध गीत: “जैंता एक दिन तो आलो”।

