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डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल-जीवन परिचय और रचनाएँ

पीतांबर दत्त बड़थ्वाल का जीवन परिचय, रचनाएँ एवं साहित्यिक योगदान | Gyan Pragya

डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल: जीवन परिचय

डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल हिंदी साहित्य के एक प्रख्यात आलोचक, निबंधकार और विद्वान शोधकर्ता थे। उन्हें हिंदी साहित्य जगत में विशेष रूप से निर्गुण भक्ति धारा और संत साहित्य पर उनके गहन शोध के लिए जाना जाता है।

  • जन्म: 13 दिसंबर 1901
  • जन्म स्थान: पाली गाँव, लैंसडाउन, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)
  • पिता का नाम: पंडित गौरीदत्त बड़थ्वाल
  • मृत्यु: 24 जुलाई 1944 (मात्र 43 वर्ष की अल्पायु में)

शैक्षिक उपलब्धियाँ और कीर्तिमान

डॉ. बड़थ्वाल की शिक्षा मुख्य रूप से कानपुर और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में हुई। उन्होंने अकादमिक क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण मील के पत्थर स्थापित किए।

हिंदी के प्रथम डी.लिट (D.Litt)

डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल हिंदी विषय में डी.लिट (D.Litt) की उपाधि प्राप्त करने वाले भारत के प्रथम व्यक्ति थे। उन्होंने अपना शोध कार्य ‘बाबू श्यामसुंदर दास’ के निर्देशन में पूर्ण किया था।

शोध प्रबंध का विषय:

उनका शोध प्रबंध अंग्रेजी भाषा में ‘The Nirguna School of Hindi Poetry’ शीर्षक से था, जिसे बाद में हिंदी में ‘हिंदी काव्य में निर्गुणवाद’ के नाम से प्रकाशित किया गया।

प्रमुख साहित्यिक रचनाएँ

उन्होंने हिंदी साहित्य, विशेषकर संत साहित्य और मध्यकालीन साहित्य के रहस्यों को उजागर करने के लिए कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना और संपादन किया।

महत्वपूर्ण ग्रंथ

  • हिंदी काव्य में निर्गुणवाद: यह उनका सबसे प्रसिद्ध शोध ग्रंथ है।
  • गद्य सौरभ: उनके निबंधों का एक उत्कृष्ट संग्रह।
  • गोस्वामी तुलसीदास: तुलसीदास के जीवन और साहित्य पर एक आलोचनात्मक दृष्टि।
  • कबीर ग्रंथावली: कबीर के साहित्य का प्रामाणिक संपादन।
  • रूपक रहस्य: नाटक और रंगमंच के सिद्धांतों पर आधारित पुस्तक।

संपादित कार्य

डॉ. बड़थ्वाल ने प्राचीन पांडुलिपियों को खोजकर उनका वैज्ञानिक ढंग से संपादन किया। उनके संपादन कार्यों में सबसे प्रमुख ‘गोरखबानी’ है।

  • गोरखबानी: गुरु गोरखनाथ की रचनाओं का प्रमाणिक संकलन और संपादन।
  • रामानंद की हिंदी रचनाएँ: स्वामी रामानंद के पदों का संकलन।
  • सेवादास की साखियाँ: संतों की वाणी का वैज्ञानिक संपादन।

साहित्यिक योगदान और विचारधारा

निर्गुण काव्य के उद्धारक

उस समय तक हिंदी साहित्य में निर्गुण काव्य को प्रायः उपेक्षित रखा जाता था। डॉ. बड़थ्वाल ने अपनी तार्किक व्याख्याओं से यह सिद्ध किया कि निर्गुण काव्य केवल शुष्क दार्शनिकता नहीं, बल्कि उसमें गहरी संवेदनात्मक गहराई और साहित्यिक सौंदर्य भी है।

नाथ संप्रदाय पर शोध:

उन्होंने नाथ पंथ और हठयोग के गूढ़ रहस्यों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘गोरखबानी’ के माध्यम से उन्होंने नाथ साहित्य को हिंदी साहित्य की मुख्यधारा से जोड़ा।

भाषा और शैली:

उनकी भाषा शुद्ध, परिमार्जित और तत्सम प्रधान थी, किंतु उसमें कहीं भी जटिलता नहीं थी। उनकी शैली गवेषणात्मक (Research-oriented) और विश्लेषणात्मक थी।

निष्कर्ष और सम्मान

डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने बहुत ही कम आयु में वह कार्य कर दिया, जो सदियों तक हिंदी शोधार्थियों का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा। उन्होंने लुप्तप्राय पांडुलिपियों को खोजकर हिंदी साहित्य की अमूल्य सेवा की।

  • उन्हें हिंदी शोध का ‘पुरोधा’ माना जाता है।
  • उत्तराखंड सरकार ने उनकी स्मृति में ‘डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद’ (SCERT) का नामकरण किया है।
  • पौड़ी गढ़वाल के राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय का नाम भी उनके सम्मान में रखा गया है।
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